एक स्टील फ़्रैम में बंद और सिंगल स्लैब की तरह ट्रांसपोर्ट की जाने
वाली ड्रॉप-इन पिचें क़रीब 24 मीटर लंबी होती हैं. इनकी चौड़ाई तीन मीटर,
गहराई 20 सेंटीमीटर और वज़न क़रीब 30 टन होता है.
इस मशीनरी के मामले में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होती है, जो इतनी लंबी, भारी और चौड़ी होती है कि पिच को यहां से वहां ले जाया जा सके.
इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई कम फ़्लोटेशन वाली आउटफ़ील्ड को नुक़सान नहीं पहुंचाती. और जहां ये उपलब्ध नहीं होती, वहां क्रेन और लिफ़्टिंग फ़्रैम इस्तेमाल की जाती है.
. के मुताबिक न्यूज़ीलैंड के ईडन पार्क, ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में एएनज़ेड स्टेडियम, मेलबर्न के कोलोनियल स्टेडियम, न्यूज़ीलैंड के डुनेडिन और वेलिंग्टन स्टेडियम, लॉर्ड और एमएसजी में इस्तेमाल की जा रही हैं या की जाएंगीवरिष्ठ खेल पत्रकार धर्मेंद्र पंत ने बताया कि ड्रॉप-इन पिचों के इस्तेमाल का आइडिया दरअसल न्यूज़ीलैंड में आया था, जहां रग्बी ख़ूब खेली जाती है. ऐसे में एक ही मैदान को रग्बी और क्रिकेट, दोनों के लिए इस्तेमाल करने के लिए ड्रॉप-इन पिचों पर दांव खेला गया.
उन्होंने कहा, ''ये ऐसी पिच होती है, जिसे कहीं और बनाया जाता है लेकिन क्रिकेट मैच शुरू होने से कुछ दिन पहले पिच को मैदान में लाकर फ़िट कर दिया जाता है ताकि सामंजस्य बनाया जा सके.''
पंत ने बताया, ''पर्थ के ऑप्टस मैदान की ड्रॉप-इन पिच पर पहले वनडे हो चुका है और भारतीय टीम भी ऑकलैंड में ऐसी ही पिच पर खेल चुकी है.''
लेकिन ऐसा नहीं कि ड्रॉप-इन पिचों को हमेशा हाथों-हाथ लिया गया है. साल 2005 में ब्रिसबेन क्रिकेट ग्राउंड, गाबा ने ड्रॉप-इन पिचों को इस्तेमाल करने से मना कर दिया था. यहां प्रशासन का कहना था कि शहर का मौसम कुछ ऐसा है कि पिच को पारंपरिक तरीक़े से बनाना ही ज़्यादा बेहतर विकल्प है.
हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के ही मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड और न्यूज़ीलैंड में ऐसी पिचें ख़ूब इस्तेमाल होती रही हैं.
इसके अलावा अमरीका में भी ड्रॉप-इन पिचों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा होती रही है. अमरीका में एक स्टेट से दूसरे स्टेट में मिट्टी ले जाने को लेकर सख़्त नियम हैं और इस वजह से मैदान से दूर कहीं और की मिट्टी इस्तेमाल कर पिच बनाना आसान नहीं है.
क्रिकेट आयोजक न्यूयॉर्क, कैलिफ़ोर्निया और फ़्लोरिडा जैसे शहरों में मैचों का आयोजन कराना चाहते हैं लेकिन ड्रॉप-इन पिचें बनाने के लिए इन स्टेट में क़ायदे की मिट्टी मिलती नहीं है.
ऑप्टस मैदान के नए पिच क्यूरेटर ब्रेट सिपथोर्प का कहना है कि ये टेस्ट मैच शायद पांच दिन नहीं चल पाएगा और टॉस जीतने वाली टीम ख़ुद गेंदबाज़ी का विकल्प ही चुनेगी.
उन्होंने पर्थ नाऊ से कहा, ''इस टेस्ट सिरीज़ में गाबा में कोई मैच नहीं होगा. इसलिए ये इकलौता ग्राउंड है, जहां तेज़ और बाउंसी पिच हो सकती है.''
हालांकि, इस मैदान को इस तरह बनाया गया है कि समंदर से आने वाली हवा गेंदबाज़ों को मदद ना दे लेकिन पिच क्यूरेटर का कहना है कि ये पिच स्विंग गेंदबाज़ के लिए स्वर्ग साबित हो सकती है.
लेकिन अगर ये पिच बाहर बनी है तो फिर इसमें पिच क्यूरेटर की क्या भूमिका होती है और वो कैसे इस पर टिप्पणी कर रहे हैं, इस सवाल के जवाब में पंत ने कहा, ''पिच मैदान में बनाई जाए या बाहर, वो होती क्यूरेटर की ही देखभाल में है. साथ ही ड्रॉप-इन पिचों के मामले में भी मौसम, ख़ास तौर से बादल छाने और हवा का फ़र्क़ पड़ता है.''
इस मशीनरी के मामले में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होती है, जो इतनी लंबी, भारी और चौड़ी होती है कि पिच को यहां से वहां ले जाया जा सके.
इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई कम फ़्लोटेशन वाली आउटफ़ील्ड को नुक़सान नहीं पहुंचाती. और जहां ये उपलब्ध नहीं होती, वहां क्रेन और लिफ़्टिंग फ़्रैम इस्तेमाल की जाती है.
. के मुताबिक न्यूज़ीलैंड के ईडन पार्क, ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में एएनज़ेड स्टेडियम, मेलबर्न के कोलोनियल स्टेडियम, न्यूज़ीलैंड के डुनेडिन और वेलिंग्टन स्टेडियम, लॉर्ड और एमएसजी में इस्तेमाल की जा रही हैं या की जाएंगीवरिष्ठ खेल पत्रकार धर्मेंद्र पंत ने बताया कि ड्रॉप-इन पिचों के इस्तेमाल का आइडिया दरअसल न्यूज़ीलैंड में आया था, जहां रग्बी ख़ूब खेली जाती है. ऐसे में एक ही मैदान को रग्बी और क्रिकेट, दोनों के लिए इस्तेमाल करने के लिए ड्रॉप-इन पिचों पर दांव खेला गया.
उन्होंने कहा, ''ये ऐसी पिच होती है, जिसे कहीं और बनाया जाता है लेकिन क्रिकेट मैच शुरू होने से कुछ दिन पहले पिच को मैदान में लाकर फ़िट कर दिया जाता है ताकि सामंजस्य बनाया जा सके.''
पंत ने बताया, ''पर्थ के ऑप्टस मैदान की ड्रॉप-इन पिच पर पहले वनडे हो चुका है और भारतीय टीम भी ऑकलैंड में ऐसी ही पिच पर खेल चुकी है.''
लेकिन ऐसा नहीं कि ड्रॉप-इन पिचों को हमेशा हाथों-हाथ लिया गया है. साल 2005 में ब्रिसबेन क्रिकेट ग्राउंड, गाबा ने ड्रॉप-इन पिचों को इस्तेमाल करने से मना कर दिया था. यहां प्रशासन का कहना था कि शहर का मौसम कुछ ऐसा है कि पिच को पारंपरिक तरीक़े से बनाना ही ज़्यादा बेहतर विकल्प है.
हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के ही मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड और न्यूज़ीलैंड में ऐसी पिचें ख़ूब इस्तेमाल होती रही हैं.
इसके अलावा अमरीका में भी ड्रॉप-इन पिचों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा होती रही है. अमरीका में एक स्टेट से दूसरे स्टेट में मिट्टी ले जाने को लेकर सख़्त नियम हैं और इस वजह से मैदान से दूर कहीं और की मिट्टी इस्तेमाल कर पिच बनाना आसान नहीं है.
क्रिकेट आयोजक न्यूयॉर्क, कैलिफ़ोर्निया और फ़्लोरिडा जैसे शहरों में मैचों का आयोजन कराना चाहते हैं लेकिन ड्रॉप-इन पिचें बनाने के लिए इन स्टेट में क़ायदे की मिट्टी मिलती नहीं है.
ऑप्टस मैदान के नए पिच क्यूरेटर ब्रेट सिपथोर्प का कहना है कि ये टेस्ट मैच शायद पांच दिन नहीं चल पाएगा और टॉस जीतने वाली टीम ख़ुद गेंदबाज़ी का विकल्प ही चुनेगी.
उन्होंने पर्थ नाऊ से कहा, ''इस टेस्ट सिरीज़ में गाबा में कोई मैच नहीं होगा. इसलिए ये इकलौता ग्राउंड है, जहां तेज़ और बाउंसी पिच हो सकती है.''
हालांकि, इस मैदान को इस तरह बनाया गया है कि समंदर से आने वाली हवा गेंदबाज़ों को मदद ना दे लेकिन पिच क्यूरेटर का कहना है कि ये पिच स्विंग गेंदबाज़ के लिए स्वर्ग साबित हो सकती है.
लेकिन अगर ये पिच बाहर बनी है तो फिर इसमें पिच क्यूरेटर की क्या भूमिका होती है और वो कैसे इस पर टिप्पणी कर रहे हैं, इस सवाल के जवाब में पंत ने कहा, ''पिच मैदान में बनाई जाए या बाहर, वो होती क्यूरेटर की ही देखभाल में है. साथ ही ड्रॉप-इन पिचों के मामले में भी मौसम, ख़ास तौर से बादल छाने और हवा का फ़र्क़ पड़ता है.''